मंच ,गोष्ठी ,बहस ,सड़क और संसद तक देश की चिंता है, समाधान घास में सुई जैसा है .सबकी नजर सामने वाले पर ,गिरहबान हाथ में और का ,चिंता के मूल में कोई और ,सिर्फ प्रश्नों का शोर ,उत्तरों का और न ठोर ,बचा रहें हैं खुद को खुद से ,मासूम बने रहने की जिद से .
Wednesday, 4 January 2012
Monday, 2 January 2012
naye varsh me
अगर बेसुध न हुए ,नए वर्ष की सुबह का स्वागत करेंगे जरूर ,दोस्ती न की अंधेरों से ,उजालों से हाथ मिलायेंगे जरूर ,काट न दिए हों अरमानों के पंख .आकाश में उड़ान भरेंगे जरूर .संवेदनाएं रेगिस्तान में न बदली हों ,दर्द से रिश्ता निभाएंगे जरूर ,नागफनी को सींच लिया हो जी भर ,बरगद को सीने से लगायेंगे जरूर ,सबक सीखें हों गलतियों से ,आगत खुशनुमा बनायेंगे जरूर .
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