मंच ,गोष्ठी ,बहस ,सड़क और संसद तक देश की चिंता है, समाधान घास में सुई जैसा है .सबकी नजर सामने वाले पर ,गिरहबान हाथ में और का ,चिंता के मूल में कोई और ,सिर्फ प्रश्नों का शोर ,उत्तरों का और न ठोर ,बचा रहें हैं खुद को खुद से ,मासूम बने रहने की जिद से .
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